हम पुराने हो चले

कविता

डॉ राकेश वर्मा

2/15/20261 min read

पुराने हो चले

किनारों पर डूबने के किस्से पुराने हो चले

हम तो अपने अपनों में ही बेगाने हो चले

लो मिलकर रोने लगे दीवारों से गले अब

लो हम भी दीवानों की तरह दीवाने हो चले

धज्जियाँ बटोर के जब ओढ़ी चुप्पी हमने

कहने लगी ज़िंदगी तुम तो सयाने हो चले

जब हो न सका ठिकाना किसी के दिल में

लगा कर आग सीने में हम मस्ताने हो चले

फ़िर हुई मेहरबां जिंदगी थोड़ा और मुझपे

फ़िर ये रातें तन्हा और दिन वीराने हो चले।।