अखनूर के पुराने अस्पताल की बदहाली पर बड़ा सवाल — दवाइयाँ धूल फाँक रही हैं, मरीज बाहर से खरीदने को मजबूर
अखनूर के पुराने अस्पताल की बदहाली पर बड़ा सवाल.
डॉ सोनिया वर्मा
9/9/20261 min read


आज हम आपको लेकर आए हैं अखनूर के उस पुराने अस्पताल में, जहाँ कभी मरीजों का इलाज और तीमारदारों की उम्मीदें जुड़ी हुआ करती थीं। लेकिन आज इस अस्पताल की हालत देखकर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—आखिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की इन सुविधाओं का रखरखाव कौन करेगा?
आप तस्वीरों में साफ देख सकते हैं कि अस्पताल परिसर में दवाइयाँ और मेडिकल सामग्री किस तरह लावारिस हालत में पड़ी हुई हैं।
एक तरफ जब कोई मरीज अस्पताल पहुँचता है, तो कई बार उसे डॉक्टर की पर्ची हाथ में देकर कहा जाता है—“ये दवाइयाँ बाहर से लेकर आइए।”
मरीज और उसके तीमारदार दवाइयों के लिए मेडिकल स्टोरों के चक्कर लगाते हैं, अपनी जेब से पैसे खर्च करते हैं और आर्थिक बोझ उठाते हैं।
लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह है कि जब अस्पतालों में दवाइयाँ उपलब्ध हैं, तो उनका उचित उपयोग और वितरण क्यों नहीं हो रहा?
यहाँ देखिए—ग्लूकोज़ की बोतलें, एनएस और अन्य मेडिकल सामग्री किस तरह रखी हुई दिखाई दे रही हैं। जिसे स्वच्छ और निर्धारित चिकित्सा मानकों के अनुसार रखा जाना चाहिए, लेकिन यहाँ व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अगर यह सामग्री उपयोग के योग्य है, तो इसे मरीजों तक क्यों नहीं पहुँचाया जा रहा?
और अगर यह उपयोग के योग्य नहीं है, तो इसे इस तरह खुले में छोड़ने के बजाय नियमों के अनुसार निस्तारित क्यों नहीं किया जा रहा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जनता के पैसे से खरीदी गई स्वास्थ्य सुविधाएँ और दवाइयाँ आखिर किसकी जिम्मेदारी हैं?
हम किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं लगा रहे, लेकिन प्रशासन से जवाब जरूर चाहते हैं।
हमारी अपील है कि अखनूर प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस मामले का संज्ञान लें, अस्पताल की स्थिति की जाँच करवाएँ और यह स्पष्ट करें कि उपलब्ध दवाइयों और मेडिकल सामग्री का उचित उपयोग क्यों नहीं हो रहा।
क्योंकि सवाल सिर्फ दवाइयों का नहीं है—
सवाल है मरीज की जिंदगी का,
सवाल है जनता के पैसे का,
और सवाल है हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही का।
आप इस खबर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ, ताकि संबंधित प्रशासन तक यह आवाज़ पहुँचे और शायद अखनूर की स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर भी किसी का ध्यान जाए।
